Sunday, August 12, 2012

सत्यमेव जयते के उद् घोष की आड़ में खोखली जागरूकता फैलाने का कारोबार


हमारे देश में बच्‍चों को फिल्‍मों, पाठ्य पुस्‍तकों, धार्मिक उपदेशों और अन्‍य सांस्‍कृतिक माध्‍यमों के ज़रिये यह बताया जाता है कि झूठ बोलना, चोरी करना, भ्रष्ट कार्य करना, दहेज लेना आदि बुरी बाते हैं और ये सब पाप हैं जिनसे हमें दूर रहना चाहिये। जब बच्‍चा कुछ बड़ा होता है, जवानी की दहलीज़ पर कदम रखता है और इन आदर्शों को गंभीरता से लेने लगता है तो उसको दुनियादार बनने का पाठ पढाया जाता है और उसको बताया जाता है कि ये आदर्श किताबों और फिल्‍मों में तो ठीक हैं, लेकिन इनको गूथकर दो वक्‍त की रोटी नहीं बनायी जा सकती और इसलिए युवाओं को अपने कॅरियर पर ध्‍यान देना चाहिए, उन्‍हें अपने बारे में सोचना चाहिए, अपने परिवार के बारे में सोचना चाहिए। शासक वर्ग के विभिन्‍न हिस्‍सों के बीच अपने-अपने मीडिया और प्रचारतंत्र के ज़रिये युवाओं में यह जागरूकता पैदा करने की होड़ लगी रहती है कि उन्‍हें राजनीतिक और सामाजिक पचड़ों में पड़ने की बजाय अपने घर, अपनी गाड़ी अपनी आने वाली पीढी के भविष्‍य के बारे में सोचना चाहिए (लड़के की शिक्षा और लड़की की शादी के लिए) तथा अपने सुखी रिटायरमेंट के लिए संपत्ति बनाने में जुट जाना चाहिए। इस प्रकार उम्र के इस निर्णायक मोड़ पर उनको सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से काटकर कर एक सुनियोजित तरीके से उनका अराजनीतिकरण कर दिया जाता है। दूसरे शब्‍दों में उनको कूपमण्‍डूक बना दिया जाता है और उनको य‍ह यकीन दिला दिया जाता है कि ज़िंदगी की चूहा-दौड़ में पशुवत उछल कूद कर दूसरों को पछाड़ना ही ज़िंदगी का मक़सद है।

लेकिन जब ज़िंदगी की इस चूहा-दौड़ का अवश्‍यंभा‍वी दुष्‍परिणाम सामाजिक और आर्थिक समस्‍याओं और संकटों के रूप में सामने आता है तो शासक वर्ग को यह डर सताने लगता है कि कहीं युवा पीढी में यह जागरूकता न पैदा हो जाये कि दरअसल इन समस्‍याओं और संकटों की जड़ घोर असमानता और मुना़फ़े की अंधी हवस पर टिकी सामाजिक और आर्थिक व्‍यवस्‍था है और कहीं उसकी चेतना इस सच्‍चार्इ तक न पहुंच जाये कि तमाम समस्‍याओं और संकटों से निज़ात पाने के लिए इस व्‍यवस्‍था को बदलकर एक मानव केंद्रित व्‍यवस्‍था का निर्माण करना न सिर्फ़ ज़रूरी है बल्कि संभव भी है। इसलिए शासक वर्ग एक नया पैतरा अपनाता है। अपने उसी प्रचारतंत्र के माध्‍यम से युवा वर्ग में ऐसी खोखली जागरूकता पैदा करने का आडंबर रचता है जिससे लोगों को समस्‍याओं की जड़ पता ही न चले और उनमें यह भ्रांति फैल जाये कि समस्‍यायें दरअसल व्‍यवस्‍थागत नहीं बल्कि चंद बुरे लोगों की वजह से हैं और लोगों में जागरूकता की कमी की वजह से हैं। एक बार लोग जागरूक होकर इन बुरे लोगों को हिक़ारत भरी निगाह से देखने लगेंगे तो सारी समस्‍यायें छूमंतर हो जायेंगी। इस प्रकार मौजूदा व्‍यवस्‍था पर कोई आंच भी नहीं आयेगी और लोगों में यह भ्रम भी बना रहेगा कि धीरे-धीरे करके लोगों में जागरूकता पैदा होगी और समस्‍याओं का समाधान हो जायेगा। यही नहीं, उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के युग में पिछले दो दशकों से इस प्रकार की नपुंसक जागरूकता पैदा करने को न सिर्फ़ व्‍यवस्‍था विरोधी आग पर ठंडे पानी के छींटे फेंकने के काम के लिए बढावा दिया गया है बल्कि इसलिए भी कि यह बेहिसाब मुनाफ़ा पीटने का विश्‍वव्‍यापी कारोबार भी है। दुनिया भर में लाखों एन जी ओ  खोखली जागरूकता पैदा करने के इस घृणित कारोबार में लिप्‍त हैं और उनको फंड करती हैं, दैत्‍याकार बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां और उनसे संबद्ध फंडिंग एजेंसियां और इस पूरे गोरख धंधे की ब्रांडिंग के लिए इसे नाम दिया जाता है कॉरपोरेट सोशल रिस्‍पांसिबिलिटी या ठेठ भाषा में कहें तो धंधेबाजों की सामाजिक जिम्‍मेदारी। इसी धूर्तता भरे धंधे को अंजाम देने के लिए लोगों की ज़िंदगी, बीमारी और तकलीफों से सौदेबाजी करने वाली बहुराष्‍ट्रीय फार्मा कंपनियां अपने अकूत मुनाफे़ का छोटा सा टुकड़ा स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में जागरूकता पैदा करने वाले एन जी ओ को देती हैं, पर्यावरण को बेइन्‍तहा तबाही पहुंचाने वाली तेल, गैस और ऑटोमोबाइल कंपनियां पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के अभियानों को फंड करती हैं तथा आकंठ भ्रष्‍टाचार में डूबे कॉरपोरेट घराने भ्रष्‍टाचार विरोधी मुहिम का पुरज़ोर समर्थन करते हैं।

यूं तो भारत में से खोखली जागरूकता फैलाने का यह गोरख धंधा पिछले कई वर्षों से जारी है, लेकिन पिछले दिनों इसमें जबर्दस्‍त कारोबारी उछाल देखने में आया है। कारण है सामाजिक मुदृों के प्रति जागरूकता फैलाने का नया रियैलटी शो सत्‍यमेव जयते। लोगों में जागरूकता का वहम कुछ इस कदर पैदा करने के लिए कि शोषक व्‍यवस्‍था को खंरोच तक न पहुंचे, एक ऐसे अभिनेता की दरकार थी जो इस पाखण्‍डपूर्ण कार्य को बखूबी अंजाम दे सके और इसके लिए 'मिस्‍टर परफेक्‍शनिस्‍ट' आमिर खान से बेहतर और कोई नहीं अभिनेता हो ही नहीं सकता था जिन्‍होंने सामाजिक मुदृों से सरोकार रखने वाले चिंतनशील अभिनेता के रूप में सुनियोजित ढंग से खुद की 'ब्रांड बिल्डिंग' की है। युवा वर्ग के अच्‍छे खासे हिस्‍से में इस 'ब्रांड बिल्डिंग' का असर इतना ज्‍़यादा है कि यदि आप सत्‍यमेव जयते की आड़ में चल रहे गोरख धंधे के बारे में कोई आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी करने के ज़ुर्रत कर बैठते हैं तो आमिर खान के उत्‍साही प्रशंसक तपाक से बोल पड़ते हैं कि तो क्‍या हुआ कि वह पैसे कमा रहा है, पैसे तो सभी कमाते हैं। वो हमें सत्‍यमेव जयते के सकारात्‍मक पक्ष को देखने की राय देते हैं कि किस प्रकार आमिर खान इसके माध्‍यम से लोगों में जागरूकता फैला रहा है। इस राय को गंभीरता से लेते हुए और अपनी इस जिज्ञासा को पूरा करने के लिए कि आखिर वो कौन सी जागरूकता है जो करोड़ों रूपये की एवज में सत्‍यमेव जयते के माध्‍यम से फैलायी जा रही है, हाल ही में मैंने  यू-ट्वूब पर इस कार्यक्रम के कुछ एपिसोड देखे। निचोड़ के रूप में सत्‍यमेव जयते के अब तक प्रसारित चार एपिसोडों में आमिर खान ने करोड़ों रूपये की एवज में यह जागरूकता फैलायी है कि हमारे देश में बड़े पैमाने पर ल‍ड़कियों को पैदा होने से प‍हले ही मार दिया जाता है, हमारे देश में बाल यौन शोषण बहुत बड़े पैमाने पर होता है, हमारे समाज में दहेज नामक प्रथा प्रचलित है जिसमें शादी में लड़की वालों को लड़के वालों की फ़रमाइश पूरी करनी होती है और ऐसा न करने पर लड़की को भीषण यातनायें सहनी पड़ती हैं तथा हमारे यहां स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं में जबर्दस्‍त भ्रष्‍टाचार है जिसकी वजह से गरीबों को समुचित स्‍वास्‍थ्‍य सेवायें नहीं मिल पाती हैं। यदि इस किस्‍म के सामान्‍य ज्ञान को जानकर कोई विदेशी व्‍यक्ति अपने आपको भारत की समस्‍याओं के बारे में जागरूक होने को दावा करता तो बात समझी जा सकती थी लेकिन जब कोई भारतीय ऐसा दावा करता है तो उससे बस यही कहा जा सकता है कि यह आमिर खान की अभिनय क्षमता से ज्‍़यादा उस व्‍यक्ति के भारतीय समाज से कटाव और उसकी कूपमण्‍डूकता को दर्शाता है।

कार्यक्रम में कुछ भावुक दृष्‍यों को नाटकीय ढ़ंग से प्रस्‍तुत कर दर्शकों की आंखों में गुस्‍से की जगह आंसू लाने के बाद आमिर खान अन्‍त में इन आंसुओं को पोछने के लिए कुछ नुस्‍खे भी बताते हैं जब वो दर्शकों से अपील करते हैं कि एक दिये गये नंबर पर एस एम एस करें और कुछ चुनिंदा एन जी ओ को आर्थिक सहयोग करें। और इसके बाद वो यह सत्‍यमेव जयते के जनकल्‍याण सहयोगी के बारे में दर्शकों को बताते हैं। जी हां, इस सहयोगी के नाम का अनुमान लगाने पर कोई पुरस्‍कार नहीं है, ये है रिलायंस फाउंडेशन । आज़ाद भारत में लूट-खसोट, शोषण और भ्रष्‍टाचार का प्रतीक और सभी पार्टियों के नेताओं और तमाम वरिष्‍ठ नौकरशाहों को अपनी जेब में रखने के लिए मशहूर रिलायंस समूह अब सत्‍य की विजय की नैसर्गिक चाहत को भी अपनी मुठ्ठी में कर रहा है। इसी से सत्‍यमेव जयते और आमिर खान के पाखंड की कलई खुल जाती है।

इतिहास गवाह है कि अब तक किसी भी देश में सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों का ख़ात्‍मा शासक वर्गों द्वारा प्रायोजित खोखले जागरूकता अभियानों से नहीं बल्कि व्‍यापक जनता की भागीदारी वाले जनांदलनों द्वारा ही संभव हुआ है। निश्चित रूप से लोगों को तमाम समस्‍याओं के विभिन्‍न पहलुओं के बारे में और उनके सामाजिक और आर्थिक संरचना से जुड़ाव के बारे में जागरूक करना जनांदलनों में यकीन रखने वाले लोगों का एक बेहद ज़रूरी कार्यभार है लेकिन उतना ही ज़रूरी कार्य यह भी है कि लोगों में खोखली जागरूकता फैला कर गुमराह करने की प्रायोजित मुहिमों का पर्दाफ़ाश किया जाये।

1 comment:

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