Sunday, August 12, 2012

अण्‍णा पार्टी और उसके उत्साही समर्थकों से चन्द असुविधाजनक सवाल



अण्‍णा पार्टी*  और उसके उत्‍साही समर्थकगण,

यह अच्‍छा ही हुआ कि आखिरकार आपने ‘सिविल सोसाइटी’ वाले मुखौटे को उतार फेंका और गैर-राजनीतिक आंदोलन का लबादा खूंटी पर टांग भारतीय पूंजीवादी लोकतंत्र की चुनावी गटरगंगा में छलांग लगाने का फैसला ले लिया। आपके तमाम विरोधी और यहां तक कि कुछ पूर्व समर्थक भी इस फैसले की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। लेकिन मैं उनकी आलोचनाओं से सहमत नहीं हूं। मेरे विचार से प्रत्‍यक्ष राजनीति हर हाल में परोक्ष राजनीति से बेहतर होती है। लेकिन मेरे जेहन में कुछ सवाल उमड़-घुमड़ रहे हैं जिनको मैं आपके सम्‍मुख रखना चाहता हूं। ये सवाल नये नहीं हैं, मेरे जैसे तमाम लोग आपसे ये सवाल पिछले साल से ही पूछते आये हैं लेकिन आप अभी तक भ्रष्‍टाचार और उसमें भी जनलोकपाल के अलावा किसी मुद्दे पर बोलने से कतराते आये हैं और आपमें से कई तो ऐसे किसी सवाल को पूछने की जुर्रत करने वालों पर फौरन ही भ्रष्‍टाचारी और देशद्रोही का लेबल चस्‍पा करते रहे हैं। लेकिन मुझे यकीन है कि अब जब आपने अपनी राजनीतिक महत्‍वकांक्षा इस देश की जनता के सामने जाहिर कर दी है, आपको ये एहसास तो हो ही गया होगा कि अब आपको जनलोकपाल कानून के घोंघे से बाहर निकल कर इन सवालों से रूबरू होना ही पड़ेगा।

जंतर मंतर पर आपने अपना अनशन तोड़ने के साथ ही ‘आज़ादी की दूसरी लड़ाई’, ‘जनक्रांति’ और ‘व्‍यवस्‍था परिवर्तन’ का आहृवान भी किया। हलांकि आपने इस किस्‍म के आहृवान पिछले साल भी किये थे, लेकिन चूंकि तब आपने राजनीतिक महत्‍वकांक्षा नहीं जाहिर कि थी इसलिए आपको संदेह का लाभ दिया जा सकता था कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ़ लड़ाई को धारदार बनाने के लिए आप इन शब्‍दों को महज़ जुमले की तरह इस्‍तेमाल कर रहे थे। लेकिन अब इस तरह की जुमलेबाजी अक्षम्‍य है। अब आप इन शब्‍दों के असली मायनों में यकीन रखने वालों से मुंह नहीं चुरा सकते।

आपने देश की जनता को भरोसा दिलाते हुए कहा कि उनके जो अधिकार और ताकत जो संसद और नेताओं के हाथ में केंद्रित है, उनको फिर से जनता के हाथ में वापस दिलायेंगे। बहुत खूब! लेकिन आपने यह तो बताया ही नहीं कि इस देश की मेहनतकश जनता की हाड़-तोड़ मेहनत और प्राकृतिक संसाधनों की लूट से अर्जित की गई अपार संपत्ति जो टाटा, बिरला, अंबानी, मित्‍तल, जिंदल जैसे कॉरपोरेट घरानों की पूंजी में तब्‍दील हुई है उसको देश की जनता को वापस करने के बारे में आप क्‍या राय रखते हैं। क्‍या आपको यह नहीं लगता कि आज़ादी के बाद से जारी यह विधिसम्‍मत लूट-खसोट जो कि नेताओं और बाबुओं की भ्रष्‍टाचार और गैर कानूनी तरीके से अर्जित की गई संपत्ति से हज़ारों गुना ज्‍़यादा है उसको भी जनता को वापस दिलाने के बारे में भी आपको संज़ीदगी से सोचना चाहिए ? लूट तो आखिर लूट ही होती है चाहे वो गैर कानूनी तरीके से की गई हो या फिर लुटेरों द्वारा लुटेरों के पक्ष में बनाये गये कानूनों के ज़रिये। इस बात से तो आप भी सहमत हैं कि संसद पर लुटेरों का कब्‍ज़ा है। आखिर इसी कानूनन लूट की वजह से ही तो आलम यह है कि जहां एक ओर अरबपतियों की संख्‍या में वृद्धि के मामले में तो भारत ने विकसित देशों को भी पीछे छोड़ दिया है वहीं देश के लगभग 47 फीसदी बच्‍चे तथा लगभग 70 फीसदी माएं कुपोषण की शिकार हैं और इस मामले में भारत का रिकार्ड तो अफ्रीका के तमाम देशों की तुलना में खराब है। क्‍या आपको यह सरासर अन्‍याय नहीं लगता कि आज़ादी  के 65 सालों बाद भी जहां एक ओर देश की कुल जनसंख्‍या के हिसाब से मुठ्ठी भर लोग विलासिता और ऐशो आराम भरी जिंदगी जी रहे हैं वहीं देश की बहुसंख्‍यक आबादी इंसानी जिंदगी की  बुनियादी ज़रूरतों से भी महरूम है, 18 करोड़ लोग बेघर हैं और इससे कहीं ज्‍यादा झुग्‍गी झोपडि़यों के अमानवीय हालात में जीवन बसर कर रहे हैं? ज़ाहिर है कि इन समस्‍याओं के समाधान के लिए आपको अपनी सोच को जनलोकपाल के संकुचित दायरे से बाहर निकलना होगा और अपनी कल्‍पना को नयी उड़ान देनी होगी।

आपकी पार्टी के भावी नेता अरविंद केजरीवाल ने अपना अनशन तोड़ने के बाद कहा कि जिंदगी में पहली बार इतने दिनों तक भूखे रहने के बाद उन्‍हें यह एहसास हुआ कि भूख क्‍या होती है और पहली बार देश के लाखों किसान जो भूखे सोते हैं उनकी पीड़ा का एहसास हुआ। चलिए देर से ही सही आपको ये एहसास तो हुआ! लेकिन अब इस एहसास को थोड़ा गहराई देकर यह भी सोचिए इसका कारण क्‍या है। पिछले दो दशकों से जारी उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों की वजह से कृषि की लागत में भारी बढ़ोत्‍तरी हुई है, लाखों किसान  आत्‍महत्‍या करने के लिए मजबूर हुए हैं, विकास के नाम पर करोड़ों लोगों को उनकी जीविका के से साधनों से बेदखल कर उनको विस्‍थापित कर दिया गया है। इन नीतियों के बारे में आप क्‍या सोचते हैं?

इस देश के गावों और शहरों में लगातार बढ़ती बेरोज़गारी, अर्द्ध-बेरोज़गारी और प्रच्‍छन्‍न बेरोज़गारी से तो आप वाकिफ़ ही होंगे। आप इस सच्‍चाई से भी अनजान न होंगे की इस देश की काम करने वाली आबादी का 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में काम करता है जो बेहद अमानवीय परिस्थितियों में 12-14 घंटे काम करने के बावजूद इतना भी नहीं कमा पाते कि उनके परिवार की दो जून की रोटी, उनके बच्‍चों की शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य की सुविधायें हासिल हो सकें। जो थोड़े बहुत अधिकार श्रम कानूनों में दिये गये हैं उनका कहीं कोई पालन नहीं होता है। उल्‍टे अब श्रम कानूनों को ज्‍यादा से ज्‍यादा पूंजीपतियों के पक्ष में करने की कवायद की जा रही है। ऐसे में ‘जनक्रांति’ और ‘व्‍यवस्‍था परिवर्तन’ का दावा करने वालों को तो अपने घोषणापत्र में यह साफ साफ लिखना चाहिए कि वो सत्‍ता में आने पर काम करने के अधिकार, काम करने की मानवीय परिस्थितियों के अधिकार, सभी नागरिकों  के लिए शिक्षा ही नहीं बल्कि स्‍वास्‍थ्‍य और पोषणयुक्‍त भोजन के अधिकार को संवैधानिक संशोधन के ज़रिये मूलभूत अधिकारों का दर्जा देंगे। क्‍या आप यह साहस कर पायेंगे ? शायद आप कहेंगे कि इसके लिए पैसा कहां से आयेगा। आप तो जानते ही हैं कि इस देश के पूंजीपतियों, नेताओं और बाबुओं के पास जो अथाह संपत्ति है वह देश की जनता की ही तो है। जिस प्रकार आज़ादी की पहली लड़ाई में ज़मींदारों और राजे रजवाड़ों की संपत्ति जब्‍त करने का वायदा किया गया था। क्‍या उसी प्रकार आज़ादी की दूसरी लड़ाई में यह न्‍यायसंगत न होगा कि मौजूदा शासकों की संपत्ति,  जो दरअसल जनता को लूट खसोटकर ही अर्जित की गई है, को जनता के हित में इस्‍तेमाल करने का वायदा किया जाये। यही नहीं इस देश के मंदिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों, गिरजाघरों और बाबाओं के आश्रमों में जो अकूत संपत्ति पड़ी हुई है, वो भी तो जनता की है। उसको भी जनता के हितों में लगाने के बारे में आपकी क्‍या राय है ?   

आप अपने मंचों से अक्‍सर कहते आये हैं कि आप अहिंसा में विश्‍वास करते हैं। आपको तो मालूम ही है कि इस देश के शासकों ने तथा‍कथित माओवादियों से लड़ने के नाम पर पिछले कुछ सालों से इस देश की  ग़रीब आदिवासी जनता के खि़लाफ़ अघोषित युद्ध छेड़ रखा है जिसकी चपेट में मासूम बच्‍चों से लेकर बुजुर्ग और महिलायें तक आ गये हैं। उम्‍मीद करता हूं कि जनता की आपकी परिभाषा में फेसबुक पर आपको ‘लाइक’ करने वालों लोग ही नहीं बल्कि ये आदिवासी भी आते होंगे। जनता के खिलाफ़ शासकों की इस हिंसात्‍मक कार्रवाई को तुरंत बंद करने के  बारे में आप क्‍या राय रखते हैं? पिछले कुछ सालों से जनता के पक्ष में बोलने वाले तमाम बुद्धिजीवियों को अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे देश द्रोह कानून के तहत मुकदमे चलाये जा रहे हैं। गौरतलब है कि इसी काले कानून के तहत गांधीजी पर भी मुकदमा चलाया गया था। यही नहीं, आज़ादी के बाद इस देश के देशी शासकों ने (जिनको अन्‍ना सही ही काले अंग्रेज कहते हैं) न सिर्फ अंग्रेजों द्वारा बनाये गये काले कानूनों को ज़ारी रखा बल्कि तमाम नये काले कानून (मसलन यू ए पी ए, राष्‍ट्रीय सुरक्षा कानून) बनाकर जनता के जनवादी अधिकारों का धड़ल्‍ले से हनन किया। ऐसे मे जनता आपसे उम्‍मीद करेगी कि आप इन तमाम काले कानूनों को रद्द करने का वायदा करें।

मैं यह भी उम्‍मीद करता हूं कि जनता की आपकी परिभाषा में पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों और कश्‍मीर के लोग भी आते होंगे। यह जनता दशकों से अपनी स्‍वायत्‍तता और आत्‍मनिर्णय के अधिकार के लिए संघर्षरत हैं। अब तक तो आप बड़ी ही चालाकी से ऐसे मुदृों से कन्‍नी काटते आये हैं। लेकिन अब जब आपने अपना राजनीतिक स्‍वरूप उजागर कर दिया है, आपको इन इलाकों की जनता के सवालों और संघर्षों से भी रूबरू होना ही पड़ेगा। आप तो अपना अनशन दस दिन तक भी नहीं चला पाये। मणिपुर की इरोम शर्मिला तो भारतीय सेना की ज्‍्यादतियों के विरोध में और ए एफ एस पी ए कानून को वापस लेने की मांग पर पिछले दस साल से भी ज्‍्यादा समय से अनशन पर हैं। उनकी मांगों के बारे में आपके क्‍या विचार हैं?   

आपने अपने मंच से यह भी कहा कि आप धर्म निरपेक्षता में यकीन रखते हैं। ऐसे में देश की जनता आपसे उम्‍मीद करेगी कि आप सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ़ खुलकर संघर्ष करें। धर्म निरपेक्षता में यकीन रखने वाले तमाम नागरिकों का मानना है कि आज़ादी के बाद हुए सांप्रदायिक दंगे इस देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की शह पर हुए, हलांकि इस देश की सड़ी गली न्‍यायिक व्‍यवस्‍था की वजह से किसी भी बड़े नेता को कोई सजा नहीं हुई । क्‍या आप इस देश की जनता को भरोसा दिलायेंगे कि जगदीश टाइटलर, सज्‍जन सिंह, बाल ठाकरे और नरेंद्र मोदी जैसे राक्षसों के खिलाफ नरसंहार का मुकदमा चलायेंगे?

आपने भारतीय राजनीति की दिशा बदलने के लंबे चौड़े दावे और वायदे किये हैं। अब तो आपको जनता के असुविधाजनक सवालों का सामना करना ही पड़ेगा। आप इस किस्‍म के दावे और वायदे करने वाले पहले लोग नहीं हैं। जे पी और वी पी सिंह के आंदोलनों ने भी कुछ ऐसा ही दावा किया था। लेकिन चूंकि वो इन सवालों का हल ढूंढने का साहस नहीं कर सके  इसलिए उनका हश्र हमारे सामने है। अगर आप भी यह साहस न कर सके तो जनता की निगाहों में आप भी उन्‍हीं नेताओं की फेहरिस्‍त में शामिल हो जायेंगे जिनका आज इतना बढ़ चढ़ कर विरोध कर रहे हैं।


* चूंकि अभी तक पार्टी का कोई नाम नहीं सुनने में आया है इसलिए 'अण्‍णा पार्टी' नाम का इस्‍तेमाल किया गया है।

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